Monday, July 7, 2008

सीताराम
श्रीमद् जानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदास चरणकमलेभ्यो नम:


रामाभिरामं नयनाभिरामं वचनाभिरामं वदनाभिरामं
सर्वाभिरामं च सदाभिरामं वन्देSहम दाशरथिम च रामं

“I adore the RAma,
who delights the delight itself,
who is delightful to the eyes,
who delights and enchants with his speech,
whose body is so very delightful and enchanting,
who is forever and always delightful,
whose everything is delightful
and is all and all delight personified
I adore, that very RAma,
the beloved son of King Dasharatha”
मर्यादा-पुरुषोत्तम हे राम! तुम्हें जग ने माना
- सीतारामकिंकर
मर्यादा-पुरुषोत्तम हे राम! तुम्हें जग ने माना,
किंतु मर्म इस संबोधन का राघव! कुछ ही ने जाना

प्रचलित मर्यादा थी तो यही की राज्य बड़े का होता है,
फ़िर सुनकर निज-अभिषेक तुम्हे क्यों शोक अपरिमित होता है ?
भिलिनी के आश्रम में जा मर्यादा क्यों न निभाते हो,
वहां तो "केवल प्रेम ही मानूं" इतना कह रह जाते हो १

कपि सुग्रीव बन्धु-भय-व्याकुल आया शरण तुम्हारी,
देख के दारुण-दुःख निज-जन के भूले मर्यादाएं सारी
बाली-वधा व्याध ज्यों हे हरि! और सह गए गारी,
इसीलिए राजीवनयन! तुम हो शरणागत-भय-हारी २

त्यागि सर्वस राम-शरण तकि जब आया रिपु-भाई,
कुछ ने कहा "बाँध कर रख लो", कुछ ने कहा "परीक्षा लो"
"त्याग सकूं ना शरणागत को", अस कही लियो बुलाई,
राखी लाज विभीषण की प्रभु राजनीति रणनीति भुलाई ३

राज-धर्म की मर्यादा जग में तो थी विख्यात यही,
अन्याय न हो किंचित भी कहीं, सब पर समान अनुशासन हो
कुछ हतप्रभ हो, कुछ आहत हो, सिया-वियोग-विषम-विष पी,
अन्याय प्रजा-जन के दारुण, क्यों सहते हो हे राम! कहो ?

गर्भस्थ पुत्र का पद-प्रहार, माँ-ह्रदय हर्ष से भरता है,
ऐसे इस संबंध को भी क्या मर्यादा कोई कहता है ?
वैसे ही वात्सल्य सिया का कैसा अनुपम लगता है !
वैदेही-निंदक प्रजा-जनों पर कैसी प्रभु कि ममता है !! ५

सम्मान पुरातन का करके, मर्यादा नई सिखा देते, और,
उभय-मध्य निज मधुर-चरित से सुंदर सेतु बना देते
सरल-चरित है, सरल-स्वभाव, सरल मधुरतम नाम है,
त्रिभुवन-पति जगदीश, किंतु संकोची मेरे राम हैं ६
श्रीसीतारामचंद्रार्पणमस्तु